लोकदर्शन कोरपना 👉अशोककुमार भगत
गडचांदूर – कोरपना के समीप प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे नाले के किनारे स्थित हजरत अब्दुल रहमान दुल्हेशहा बाबा कुसल की पावन दरगाह में 27 फरवरी से वार्षिक उर्स एवं यात्रा महोत्सव का शुभारंभ होने जा रहा है। हर वर्ष की तरह इस बार भी होली से पहले आयोजित होने वाला यह उर्स हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे का अद्भुत संदेश देगा।
दरगाह का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार हजरत दुल्हेशहा बाबा नवविवाहित वर के रूप में बारात लेकर जा रहे थे, तभी वे अपने घोड़े सहित इस स्थान पर अदृश्य हो गए। कुछ समय बाद कुसळ समाज के लोगों को घास काटते समय यहां पत्थर की मजार दिखाई दी। तभी से यह स्थान आस्था का केंद्र बन गया। स्वतंत्रता पूर्व काल से यहां उर्स मनाया जा रहा है। गांव के समीप आज भी प्राचीन गढ़ी के अवशेष, अनाज भंडारण के पेव तथा खेतों में मिलते पुराने कृषि औजार और बर्तन इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की गवाही देते हैं। पास स्थित देवघाट में भी प्राचीन मूर्तियां और ऐतिहासिक चिन्ह मौजूद हैं, जो कुसल और देवघाट की पुरातन बसाहट को दर्शाते हैं।
दुल्हेशहा बाबा ट्रस्ट कमेटी द्वारा श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। तीन दिनों तक विशाल लंगर का आयोजन किया जाएगा।
कार्यक्रम इस प्रकार रहेंगे:
27 फरवरी – कुरानखानी और परचम कुशाई
28 फरवरी – कोरपना जामा मस्जिद से संदल और चादर जुलूस ढोल-ताशों के साथ मजार पर पेश किया जाएगा। आसपास के कई जिलों से संदल शरीक होंगे।
1 मार्च – कव्वाली का शानदार कार्यक्रम एवं कौमी एकता समारोह आयोजित किया जाएगा। इस अवसर पर विधायक देवराव भोंगले मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे।
यात्रा को शांतिपूर्ण एवं सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने हेतु कोरपना की ठानेदार लता वाढीवे ने स्थल का निरीक्षण कर पार्किंग और सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था की है।
*कमेटी के अध्यक्ष आबिद अली,* *राजू कादरी,* अजीम बेग, इरफान शेख सहित उर्स कमेटी के शहेबाज अली, मोहब्बत खान, सुहेल अली, नईम शेख, इसराईल, नदीम सय्यद, बाबाराव सिडाम, वैभव किन्नाके, शुभम पंधरे, कपिल आत्राम, पियुश आत्राम और शुभम कोडपे आयोजन को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। तीन दिवसीय लंगर की व्यवस्था सलीम पारेख, जुनैद अली और मकसूद पारेख द्वारा संचालित की जाएगी।
यह उर्स न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता, सामाजिक सद्भाव और परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है, जहां सभी समुदायों के लोग मिल-जुलकर श्रद्धा और प्रेम के साथ भाग लेते हैं।





